लखनऊ के King George’s Medical University यानी केजीएमयू से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। इलाज के लिए आने वाले मरीज और उनके परिजन पहले ही बीमारी, पैसे और मानसिक तनाव से जूझ रहे होते हैं, लेकिन जब अस्पताल के अंदर ही उन्हें बुनियादी सुविधा के लिए भी संघर्ष करना पड़े, तो यह स्थिति बेहद शर्मनाक बन जाती है।
स्ट्रेचर के लिए मांगे गए पैसे, सामने आई सच्चाई
बताया जा रहा है कि एक मरीज को डिस्चार्ज के बाद थर्ड फ्लोर से नीचे लाया जा रहा था, लेकिन वहां एक भी स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं था। मजबूरी में परिजन नीचे के वार्ड में स्ट्रेचर ढूंढने पहुंचे। वहां मौजूद कर्मचारियों ने स्ट्रेचर देने के बदले 100 रुपये की मांग कर दी। इसे उन्होंने “खुशी” के नाम पर मांगा, लेकिन असल में यह सीधी-सीधी अवैध वसूली थी।
जब परिजनों ने अपनी मजबूरी बताई और कहा कि मरीज की हालत ठीक नहीं है, तो कर्मचारियों ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जो करना है कर लो, स्ट्रेचर नहीं मिलेगा। यह जवाब सुनकर परिवार पूरी तरह असहाय हो गया।
सरकारी अस्पताल में मुफ्त सुविधा भी बनी बोझ
सरकारी अस्पतालों का मकसद यही होता है कि गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त या सस्ती चिकित्सा सुविधा मिले। स्ट्रेचर जैसी चीजें तो बुनियादी सुविधाओं में आती हैं, जिनके लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन जब इन्हीं चीजों के लिए पैसे मांगे जाते हैं, तो यह सिस्टम की सबसे कमजोर कड़ी को उजागर करता है। यह घटना दिखाती है कि कैसे कुछ कर्मचारी मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। जो लोग इलाज के लिए दूर-दराज से आते हैं, उनके पास हर बार बहस करने या शिकायत करने का समय और हिम्मत नहीं होती। यही वजह है कि इस तरह की घटनाएं बार-बार होती रहती हैं।
मरीज और परिजनों की बेबसी
सोचिए उस परिवार की स्थिति, जो अपने बीमार सदस्य को सुरक्षित नीचे लाना चाहता था, लेकिन उसे स्ट्रेचर तक नहीं मिला। ऐसे समय में हर मिनट की अहमियत होती है। मरीज को सीढ़ियों या बिना सहारे ले जाना खतरे से खाली नहीं होता।
परिजन अक्सर डर के कारण आवाज नहीं उठाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके मरीज के इलाज पर असर पड़ सकता है। यही डर भ्रष्ट कर्मचारियों को और ज्यादा हिम्मत देता है।
प्रशासन की जिम्मेदारी कहां
यह सवाल उठना लाजिमी है कि अस्पताल प्रशासन आखिर कर क्या रहा है। क्या उन्हें ऐसी घटनाओं की जानकारी नहीं होती या फिर जानबूझकर अनदेखा किया जाता है।
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अगर एक बड़े संस्थान जैसे केजीएमयू में यह स्थिति है, तो छोटे अस्पतालों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यहां नियमित निगरानी और सख्त कार्रवाई की जरूरत है।
सरकार से कार्रवाई की मांग
इस मामले में प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath और स्वास्थ्य मंत्री Brajesh Pathak से लोगों ने संज्ञान लेने की मांग की है। लोगों का कहना है कि ऐसे कर्मचारियों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि दूसरों को सबक मिल सके।
अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और बढ़ेगी। गरीब मरीजों का भरोसा सरकारी अस्पतालों से उठने लगेगा, जो एक गंभीर स्थिति होगी।






