आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि यहां भर्ती और इलाज कराने आए करीब 10 मरीजों से ECG टेस्ट के नाम पर ₹300-₹300 वसूले गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पैसे लेने वाले व्यक्ति ने न तो कोई रसीद दी और न ही अपना नाम बताने को तैयार हुआ। इस पूरे मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसके बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर चर्चा तेज हो गई है।
डॉक्टर की पर्ची और बाहर का खेल
मरीजों के परिजनों का कहना है कि डॉक्टर ने ECG कराने के लिए लिखकर दिया था। आमतौर पर सरकारी अस्पतालों में इस तरह के बेसिक टेस्ट या तो मुफ्त होते हैं या बहुत कम शुल्क पर उपलब्ध रहते हैं। लेकिन यहां मरीजों को कथित तौर पर अस्पताल के अंदर ही एक प्राइवेट व्यक्ति के पास भेजा गया, जिसने हर मरीज से ₹300 लिए।
परिजनों के मुताबिक, उन्हें यह तक नहीं बताया गया कि यह सुविधा सरकारी है या निजी। जब उन्होंने सवाल पूछे तो उन्हें टाल दिया गया। कुछ लोगों ने जब रसीद मांगी तो साफ मना कर दिया गया।
बिना रसीद के कैश वसूली, बढ़े सवाल
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर पैसे लिए जा रहे थे, तो उसकी कोई आधिकारिक रसीद क्यों नहीं दी गई। बिना रसीद के कैश लेना सीधे तौर पर नियमों के खिलाफ माना जाता है। इससे यह शक और गहरा हो जाता है कि कहीं यह पूरा मामला अवैध वसूली का तो नहीं है।
वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि पैसे लेने वाला व्यक्ति कैमरे के सामने आने से बचता नजर आता है। जब उससे नाम पूछा गया तो उसने जवाब देने से इंकार कर दिया। इस व्यवहार ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है।
वायरल वीडियो ने खोली पोल
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई लोगों ने इसे सरकारी अस्पतालों में चल रही गड़बड़ियों का एक उदाहरण बताया। आम जनता का कहना है कि जहां गरीब इलाज के लिए आते हैं, वहां अगर इस तरह से पैसे वसूले जाएंगे तो उनका भरोसा कैसे बना रहेगा।
वीडियो के वायरल होने के बाद मामला तेजी से फैल गया और स्थानीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया। कई लोगों ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है।
मरीजों और परिजनों की परेशानी
इस घटना से सबसे ज्यादा परेशानी उन मरीजों और उनके परिवारों को हुई है, जो पहले ही बीमारी और इलाज के तनाव से जूझ रहे थे। ऐसे में अगर उनसे अतिरिक्त पैसे लिए जाते हैं, तो यह उनके लिए और मुश्किल खड़ी कर देता है।
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परिजनों का कहना है कि उन्हें मजबूरी में पैसे देने पड़े क्योंकि डॉक्टर ने टेस्ट जरूरी बताया था। अगर वे पैसे नहीं देते, तो मरीज की जांच रुक सकती थी। यही मजबूरी इस तरह की वसूली को बढ़ावा देती है।
अस्पताल प्रशासन पर उठे सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अस्पताल प्रशासन को इस बारे में पहले से जानकारी थी या नहीं। अगर यह सब अस्पताल परिसर के अंदर हो रहा था, तो बिना किसी की नजर में आए कैसे चल रहा था।
लोगों का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां तभी संभव होती हैं जब सिस्टम में कहीं न कहीं ढिलाई हो। अगर समय रहते निगरानी की जाए, तो ऐसे मामलों को रोका जा सकता है।






