U.P. में Maut Ke Rath को कैसे मिल रही 1 हरी झंडी? फिटनेस में खेल, यात्रियों की जान पर भारी सिस्टम की लापरवाही

By Sonam Singh

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Maut Ke Rath

यूपी में निजी एसी बसें बिना फिटनेस Maut Ke Rath और सुरक्षा मानकों के सड़कों पर दौड़ रही हैं। फिटनेस जांच में चल रहे खेल और प्रशासनिक लापरवाही यात्रियों की जान को खतरे

Maut Ke Rath में उत्तर प्रदेश में रोजाना हजारों बसें फर्राटा भरती हैं लेकिन इनमें से कई ऐसी हैं जो चलती फिरती मौत का जाल बन चुकी हैं। इन्हें लोग अब ‘मौत के रथ’ कहने लगे हैं क्योंकि इनमें न तो सुरक्षा के इंतजाम हैं, न ही फिटनेस की सच्ची रिपोर्ट। हैरानी की बात यह है कि इन बसों को फिर भी हरी झंडी मिली हुई है और ये रोज सैकड़ों यात्रियों की जान जोखिम में डाल रही हैं।

फिटनेस में खेल, यात्रियों पर खतरा

लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर से चलने वाली एमपी 70 जेडबी 8095 नंबर की एसी बस इसका बड़ा उदाहरण है और Maut Ke Rath इस बस में जहां 30 सीटें होनी चाहिए थीं, वहां 36 सीटें लगा दी गई हैं। पीछे का इमरजेंसी गेट पूरी तरह बंद है और किसी भी तरह का अग्निशमन यंत्र मौजूद नहीं है। बस इतनी कंजस्टेड है कि अगर कोई हादसा हो जाए तो सिर्फ आगे बैठे कुछ लोग ही बाहर निकल पाएंगे। बाकी लोगों के लिए बच निकलना लगभग नामुमकिन होगा। यह बस पिछले छह साल से ऑल इंडिया परमिट पर सड़कों पर दौड़ रही है।

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दर्जनों बसों में ऐसी ही खामियां

Maut Ke Rath में एमपी 70 जेडबी 8095 अकेली नहीं है। दर्जनों प्राइवेट एसी बसों की हालत भी ऐसी ही पाई गई है। ज्यादातर बसों में बॉडी को काट-छांट कर लंबाई और चौड़ाई बढ़ाई गई है। कुछ में छत पर नियम विरुद्ध लगेज कैरियर लगा है। कई बसों में इमरजेंसी गेट ही नहीं है, और वील बेस असमान्य है। यानी बसें फिटनेस रिपोर्ट में पास हैं लेकिन असल में ये सड़क पर चलने लायक भी नहीं हैं।

क्या कहते हैं नियम

नियम के मुताबिक नई बसों की फिटनेस हर दो साल में कराई जानी चाहिए और जिन बसों में खामियां मिली हैं वे पांच साल से भी पुरानी हैं। यानी उनकी फिटनेस जांच दो बार तो जरूर हुई होगी। इसका मतलब साफ है कि फिटनेस रिपोर्ट में ‘खेल’ हुआ है और Maut Ke Rath यह खेल प्राइवेट फिटनेस सेंटरों के जरिए और भी आसान बना दिया गया है।

ऐसे चल रहा है यह खेल

Maut Ke Rath में लखनऊ समेत कई जिलों में वाहन फिटनेस की जिम्मेदारी प्राइवेट हाथों में सौंप दी गई है। अब “Anywhere Fitness” सिस्टम लागू है यानी बस की जांच कहीं से भी करवाई जा सकती है। लेकिन इसी लचीलापन का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। प्राइवेट सेंटरों पर फिटनेस के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है।

झांसी में तो एक फिटनेस पास कराने के बदले हजारों रुपये वसूलने का मामला पकड़ा गया था। एफआईआर के बाद सेंटर कुछ दिन के लिए बंद हुआ, लेकिन फिर से वही हालात लौट आए। राजस्थान और अन्य राज्यों में भी ऐसी गड़बड़ियों के चलते सरकार को फिटनेस सिस्टम दोबारा अपने हाथ में लेना पड़ा।

एमवीआई जांच क्यों अटकी

यूपी में मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर (एमवीआई) को सड़कों पर उतरकर जांच करने का अधिकार दिया गया था ताकि वे बसों में तकनीकी खामियां पकड़ सकें। पर विभागीय राजनीति और अफसरों की खेमेबाजी के कारण इन अफसरों की आईडी अब तक जारी नहीं की गई है। यानी आदेश तो जारी हो गया, पर काम शुरू नहीं हुआ। नतीजा यह है कि यात्रियों की जान पूरी तरह ड्राइवरों और बस मालिकों की लापरवाही पर टिकी है। Maut Ke Rath

जब बसें बनीं मौत का फंदा

राजस्थान के जैसलमेर और आंध्र प्रदेश में पिछले महीने हुए दो बस हादसों में कुल 46 लोगों की जान चली गई थी। दोनों ही हादसों में बसों में आग लगने की घटनाएं सामने आईं। लखनऊ में भी इसी साल मई में हुई एक बस दुर्घटना में पांच लोग जिंदा जल गए थे। जांच में पाया गया कि बस में फिटनेस सिस्टम की गंभीर खामियां थीं। इस लापरवाही के लिए अफसर राघव को निलंबित भी किया गया, लेकिन सिस्टम अब भी नहीं बदला। Maut Ke Rath

यात्रियों की सुरक्षा या मुनाफे का खेल?

प्राइवेट बस मालिकों के लिए सुरक्षा और नियम अब गौण हो चुके हैं। उनके लिए मुनाफा ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया है। सीटें बढ़ाना, छत पर सामान लादना, और इमरजेंसी गेट बंद करना आम बात हो गई है। वहीं परिवहन विभाग की ढिलाई और रिश्वतखोरी इस गंदे खेल को और मजबूत कर रही है।

क्या है जरूरत

Maut Ke Rath में जरूरत है कि यूपी सरकार तुरंत प्राइवेट फिटनेस सेंटरों की समीक्षा करे और फिटनेस जांच का अधिकार दोबारा सरकारी नियंत्रण में लाए और हर बस में अग्निशमन यंत्र, खुला इमरजेंसी गेट, और मानक सीटों की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। एमवीआई को सड़कों पर उतरने की जिम्मेदारी जल्द दी जाए ताकि ऐसी लापरवाही पर लगाम लग सके

मौत की बसें

यूपी की सड़कों पर दौड़ती ये ‘मौत की बसें’ सिर्फ प्रशासन की नाकामी नहीं है बल्कि पूरे सिस्टम की बेइमानी का नतीजा हैं। जब तक फिटनेस रिपोर्ट ईमानदारी से नहीं बनेगी और एमवीआई अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तब तक हर सफर यात्रियों के लिए खतरे से खाली नहीं होग

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